ऐसे रिश्तों का सबसे भयावह पहलू वह मानसिक आघात है जो पीड़ित झेलता है। एक पोती के लिए उसका दादा मार्गदर्शक और रक्षक होता है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो उस बच्चे के मन में रिश्तों के प्रति आजीवन नफरत और अविश्वास पैदा हो जाता है। यह घाव शरीर से ज्यादा आत्मा पर गहरा होता है, जिसे 60fps की 'Full-HD' स्पष्टता भी कभी नहीं दिखा सकती।
समाज में रिश्तों की कुछ पवित्र सीमाएं (Incest Taboos) इसलिए बनाई गई हैं ताकि मनुष्य और पशु के बीच का अंतर बना रहे। जब सगे खून के रिश्तों में वासना का प्रवेश होता है, तो यह सभ्यता के मानसिक पतन को दर्शाता है। 'पोती से प्यार' जैसा कृत्य केवल एक व्यक्ति का गुनाह नहीं, बल्कि उस परवरिश और समाज की विफलता है जहाँ वासना, संस्कारों पर हावी हो जाती है। तो वह 'रिश्ता' नहीं
4. पर्दे के पीछे की कड़वी सच्चाई तो वह 'रिश्ता' नहीं
रिश्तों की खूबसूरती उनकी मर्यादाओं में है। प्यार जब अपनी सीमाएं भूलकर वासना का चोला ओढ़ लेता है, तो वह 'रिश्ता' नहीं, बल्कि एक 'कलंक' बन जाता है। हमें एक ऐसे समाज की जरूरत है जहाँ घर के बड़े बच्चों के लिए ढाल बनें, न कि उनके बचपन को कुचलने वाले शिकारी। तो वह 'रिश्ता' नहीं
1. भरोसे का कत्ल (The Betrayal of Trust)
3. मनोवैज्ञानिक घाव (Psychological Trauma)
यहाँ इस विषय पर कुछ गहरे विचार दिए गए हैं: